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बनारस के तोहफे

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मैं कभी समंझ नही पाया कि उसे क्या तोहफे देने है , उसे क्या जरूरत होगी ।उसकी हर पसंदीदा चीज़ को " हा अच्छा है ले लो " ही कहता रहा हु । मैं ये न समंझ पाया कि वो मुझे देना चाहिए या उसे खरीदने के लिये कहना चाहिए।   मैं हमेशा ठीक ठाक टाइप का ही व्यवहार करता रहा हु । ऐसे तो हम महीनों - सालों नही मिला करते है तो लेन देन हमारे प्रेम की परिचायक नही रही । दूसरा अब मेरी उम्र आजकल प्रेम में पड़े उन जोशीले प्रेमी - प्रेमिकाओं की तरह भी नही रही जो तोहफों के कतारे लगाए रहते है । एक उम्र के बाद हम सीख जाते है कि प्रेम और बिना बादल वाली बरसात में कोई फर्क नही रहता । दिन भर बरसना औऱ एक घण्टे की जोरदार बारिश में चुनना हो तो सायद हम सारे लोग एक घण्टे की घनघोर बारिश ही चुनेंगे । जब भी उससे मिलने के लिये पूछता कहती थी " ठंडी की दिनों में जब एक पूरी दिन बिना रुके बरसात होगी तो उसके अगले दिन खिलने वाली ठंडी ओस और सफेद कोहरे के बीच मिलेंगे । मैं मज़ाक में कहता " एक बार मिलने आ जाओगी न तो फिर लौटने का मन नही करेगा " वो दिन कभी न आएगा उसे भी पता था मुझे भी क्योंकि ऐस...