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हमने भी इश्क़ किया है .

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हमने इश्क़ किया है टेम्पू में पास बैठी लड़की से , जिन्हें हमेशा जल्दी रहती थी उतरने की हमने इश्क़ किया है मंदिर में चप्पल पहनते हुए बाल हटाते हुई लड़की से  हमारे यहां नही थे प्रेम पार्क , सिनेमाहाल , जो तय करके मिलते उनसे.       हमने इश्क़ किया है कोचिंग वाली से जिन्हें सायकल लेके भगने की पहले जल्दी रहती थी जो हर शनिवार विदा हो जाती थी इतवार का इंतज़ार कराने के लिये हमने उनसे इश्क़ किया है ...... हमने नही रखी पॉकेट में गुलाबे ,किताबो में चिठिया हमने इश्क़ किया है गोलगप्पा खाते हुए लड़की से जिन्हें हमेशा जल्दी रहती थी सुखी पापड़ी खाने की हमने उनसे इश्क़ किया है हमने इश्क़ किया है उनसे जिन्हें प्रेम की तमीज नही थी पर राखी पर भैया बनाने पहले आने की जल्दी रहती थी हमने कई इश्क़ कुर्बान किया है ऐसी राखियों पर हमने उनसे इश्क़ किया है हमने नही किये वादे मिलने के नही दी गिफ्ट की सौगाते हमने खर्चे किये है पेट्रोल उन अनजान लड़कियों के घरों का पता करने में दूर तलक पीछा करने में ,  हमने उनके घर जाने वाले रास्तो से इश्क़ किया है हमने इश्क़ किया है...

इस प्यार को क्या नाम दु ????

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Click to follow on Twitter नौजवानों का तो समझ आता है नव यौवन की लहरें उफान पर होती है तो इश्क़ भी परवान पर होता है पर ये चिल्ड्रेन day वाले 14 नवम्बर से अब 14 फरवरी को कुच कर चुके है   ये स्कूली बच्चे जिनकी अभी अभी कच्ची मुछे तक नही आई है  बॉलीवुडिया 16 वर्ष की उस बाली उम्र से भी कोसो दूर है  फिर ये हुस्न ,बेवफा ,दगा , इश्कियत वाली शायरी क्यों करने लगते है । ये किस महबूब की खूबसूरती देख तड़प रहे है जो महबूब अपनी स्कूल ड्रेस भी मम्मी से  प्रेस करवाती है वो भला इनके इश्क़ को  कैसे आयरन कर देती होगी । कभी कभी सोचता हूं कि इनके माँ बाप इनके फेसबुक ,इंस्टाग्राम पर नही है क्या  होंगे भी तो उनको पतोहू के नखड़ा काउंट और खर्चा के लिये बैंक अकाउण्ट से फुर्सत कहा जो सोशल मीडिया अकाउण्ट पर ज्यादा फोकस करे अगर फोकस करते तो इनके प्रेम प्रमेय का सन्दर्भ सहित व्याख्या इनके पश्च भाग अर्थात पिछवाड़े पर सुर्ख लाल अक्षरों से लिख दिए ।होते । यार जिस उम्र में हम अभी शक्तिमान देखकर तमराज किल्बिश को मारने में व्यस्त थे ..... ये उसी उम्र में प्रेम की विरह पर...

बनारस : शहर से इश्क़

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बनारस शहर नहीं उत्सव है ! विश्व भर में यह अकेली नगरी है जहाँ, त्रयाक्ष भगवान शंकर की पुनर्जीवनी अग्नि घड़ी भर के लिए भी शांत नहीं होती !  मेरे हर बार लौट-लौटकर बनारस आने के पीछे, कोई वजह नही है  बनारस ही बेवजह प्रेम है सबका अपना बनारस है किसी के लिए घाट, किसी के लिए मंदिर,किसी के लिए गलियां,हम जैसों के लिए वो निर्माणधीन धूल खाता आधुनिकता की ओर बढ़ता खूबसूरत शहर ,जहां बार बार लौट कर आने की हसरत बनी रहती है, BHU में एडमिशन की कोशिश हो , एग्जाम का सेंटर डाल कर आने की मन या दूर की शादिया निमंत्रण निभाने के बहाने बनारस जाने की चाहत  चंद लम्हो के लिए ही सही,अकेले नही उन यादो-वादो,,उन शामो और रातों की खातिर,एक कोशिश फिर से उसे जीने की बनारस आते जाते रहूंगा .जहाँ हर कोई "गुरू" या "रज्जा" है... किसी नशे की लत तो आम बात हैं,  "नशा" जब किसी शहर का हो जाये,  तो समझ लेना वो भैया बनारस है..!! कहते है कि यहां भोले बाबा का सबसे पसन्दीदा प्रसाद " भांग" मिलता है पर आप थोड़ा ही लेंगे उसके बाद    बाबा खुदे हिलाने लगते है न विश्वास हो तो आइयेगा  ... यहाँ गंग...

धोनी ❤️अनहोनी

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महेन्द्र सिंह धोनी। क्या ही कहूँ। कोचिंग मैनुअल और कॉपीबुक शैली से इतर भारतीय क्रिकेट की अमूल्य सेवा। तीन पीढ़ियों ने पसंद किया।  महेंद्र सिंह धोनी का करियर ‘सचिन आउट, टीवी बंद करो’ से लेकर ‘ रुको बे अभी धोनी है  है’ तक का एक शानदार सफ़र रहा है। धोनी मोहल्ले का वो लड़का है जिसने सपने देखने का शऊर सिखाया।  आज के  समय में जो लोग भी छोटे शहर से बड़े शहर पहुँचे, उनके मन में कहीं न कहीं अपनी फील्ड का धोनी होने का सपना था धोनी ने हमें वो ट्रेन पकड़ने की हिम्मत दी जो जेब में टिकट होते हुए भी हर बार छूट जाती थी  आधे समय में सवाल कर परीक्षा हॉल छोड़ देता है। क्रिकेट खेला के लिए नौकरी-वौकरी भी। छोड़ देता है एक पाली की कप्तानी, पूर्व कप्तान के लिए। और फिर विश्व कप जीत जाने के बाद  छोड़ देता है भीड़, उन्माद और कोलाहल आँखें ढूँढती हैं उसे औऱ उसकी मुस्कान को हर फ़ोटो फ्रेम के कोने में खड़ा ..... वो रवि शास्त्री के शब्द जिन्होंने मुहर लगाई थी कि तुमने हेलीकॉप्टर शॉट से खत्म किया सूखा 28 साल का इंसान जब जान जाता है कि उसकी सीमाएं उसके प्र...

सफ़रनामा ज़िन्दगी

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कभी कभी लगता है हार गया हूँ! ज़िंदगी से! सब ख़त्म सा लगता है! कोई दिशा नहीं समझ आती! सब कुछ भ्रमित करता है! किसी इंसान से इन्स्पायर नही होता! कभी भी नही! हाँ ख़ूबी ज़रूर अच्छी लगती है किसी की! बहुत से पॉज़िटिव लोगों से घिरा हुआ हूँ! क़िस्मत का धनी  होना ये भी है कि समझने वाला परिवार मिले , अच्छे दोस्त मिले ! पर एक समय बाद हार कोई आपसे उम्मीद करने लगता है! हर कोई! छोटा भाई, बहन, माँ-बाप सब! और ये बात बिना उनके बोले आप समझ सकते हैं! कभी कभी खुद की समझदारी भी खुदसे कठिन सवाल पूछती है.... लगता है ज्यादा समझदार होना भी गुनाह है क्या ??? कई साथी आपको कई राय देते हैं! हिंदुस्तान में राय ही एक ऐसी चीज़ है जो आदमी मुफ़्त में देता रहता है! कई लोग आपको जज करते फिरते हैं! वो आपसे मिलते ही आपको बताना शुरू कर देते हैं कि आप ग़लत कहाँ पर है!  कई ऐसे लोग भी मिलते हैं जो आपके ऐसे शुभचिंतक होते हैं जो आपकी बड़ी से बड़ी हार पर भी आपसे सकारात्मक बात करा करते ह कई बार चीज़ें धुंधली लगती हैं, समझ नही आता के पास हैं या दूर.. जैसे खिड़की पर बूँदो का जमना....... देखने पर पास लग...

अधूरी राधा

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आज प्यार भले  फेसबुक से पैदा होकर whtas app पर जवान हो जाय.. लेकिन किसी जमाने में कालेज के सामने वाली चाट की दूकान से शुरू होकर  दशहरा और जन्माष्टमी के मेला वाली जलेबी की दुकान पर ही मंजिल पाता था।…. शायद प्यार की मंजिल पाने वालों के साथ ट्रेजडी थी..क्योंकि प्यार के साथ टेक्नोलॉजी का गठबंधन न हुआ था ।लाइक,कमेंट,शेयर जैसे शब्दों की मौजूदगी  का एहसास इतना व्यापक न था. ऑनलाइन समय का दोष है…घर बैठे जोमैटो से बर्गर आ पिज़्ज़ा हट से पिज़्ज़ा माँगने वाली  और एमेजॉन,फ्लिपकार्ट और स्नैपडील पर खरीदारी करने वाली पीढ़ी को अब ये मेले,ठेले,छोले,जलेबी रास नहीं आ रहे. पर पुराना प्रेम का जिक्र तो आज भी उन्ही पुराने मेलो से सुरु होता है नौकरी की हतास और पढ़ाई की झुलास से तपे जा रहे थे जीवन मे  रुक्मिणी के लिए पढ़ाई हो रही थी पर यहां तो इनके जीवन मे राधा तक के भी दर्शन न हुए थे अभी ...पूजा पाठ वाले विचार के थे तो सोचा चलो कृष्ण जन्म पर प्रभु के दर्शन ही हो जाये  चल दिय उदासीन ज़िन्दगी को मेला की  रंगीन चौचक लाइटों के बीच टहलाते हुए  घर से दूर तो...

अपना नागाजी स्कूल

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और कुछ अपनी भी नागा जी की यादे जरूर बताएं।। वो भी क्या दिन थे न! जब कोई पूछता था किस स्कूल में पढ़ते हो तो जवाब में नागाजी ना बोलके एक ही साँस में नागाजी सरस्वती विद्या मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,  बताते थे। Pic year - 2018 निर्माणधिन विद्यालय view from first floor : Year 2018 हालांकि हम लोगो का आधा जीवन ये बताने में निकल जाता था कि "अरे भैया हम माल्देपुर वाला नागा जी मे नही बल्कि जिराबस्ति वाला में पढ़ते है" और बलिया के आधी जनता को तो ये मालूम नही की जिराबस्ति में भी कोई नागाजी चल रहा है खैर हम लोग भी कभी कभी माल्देपुर बता कर टेलर बाध देते थे दूसरे स्कूल वाले जहाँ टाई संवारते हुए बसों से स्कूल जाते थे वहीं हमलोग साईकल का हैंडल से हैंडल लड़ाते हुए अपने दोस्तों के साथ बात करते हुए जाना पसंद करते थे, वो सब जब खुद को  इंग्लिश मीडियम वाले बता के हमारे हिंदी माध्यम का उपहास उड़ाते थे तो हम अपने विद्यालय का रिजल्ट बता के उन्हें शांत कराते थे। क्लासटीचर और सब्जेक्टटीचर नहीं थे हमारे यहाँ हम तो उन्हें कक्षाचार्य और विषयाचार्य के नाम से जानते ...