ट्रेन वाली लड़की 🚂
मैं ट्रेन हमेशा जल्दी पहुँच जाता हूँ,कम से कम घण्टे पहले,
आराम से एक सीट पकड़ के बैठ कर देखता रहता हूँ
खासकर "खिड़की वाली सीट"
""क्योंकि किरदार ट्रेन में होते है पर "कहानिया" तो खिड़कियों से ही झांकती है
इसलिए मैं खिड़कियों को पकड़ लेता हूं कहानियों के लिए
कहानियाँ,कहीं मिलने की तो कहीं बिछड़ने की..
किसी के पकड़ने की तो किसी के छूटने की
पर
हर ट्रेन कहानियां जरूर दे जाता है
अक्सर मेरी क़िस्मत खराब ही रही है ट्रेन में,
मतलब ज़्यादातर कोई झुर्रियो वाला चेहरा होता है पास में
या बाहर कमाने जाने वाला शर्ट खोलकर बनियान में बैठा कोई प्रवासी
बस साल में एक दो बार ही ऐसा होता है कि सुंदर काया औऱ अदाओं की कोई माया बैठी हो आस पास
ख़ैर ठीक है, उन्हें भी तो ब्रेक चाहिए..
मैं अपनी सीट पर बैठा था फ़िल्म लगाए
" Zindgi na milegi dobara "
अचानक सिक्स्थ सेन्स ने काम करना शुरू कर दिया, लगता है कोई आ रही है बग़ल वाली सीट पर,
धक धक, आंटी हुई तो
नही नही, फिर सो जाएँगे और क्या,
मन बातें कर ही रहा था के एक आवाज़ आयी,
“Can you shift to middle seat please ?”
( दिमाग़ दौड़ा, बीच में बैठी तो खिड़की वाला भी बात कर सकता है, नही नही)
बस मैं यूपी बोर्ड का छात्र अपने अंदर की सारी इंग्लिश ग्रामर इक्कठा किया और बोला
“Yaa sure "
(ऐसे कूल हो के जवाब दिया जैसे इतना तो मैं कर ही सकता हूँ तुम्हारे लिए)
“थैंक यू”
सीट पर कम्फ़्टर्बल होने के बाद मैं अपने फ़ोन में “zindgi na milegi dobara "
देखने लग गया जैसे परवाह नही कोई भी बैठे अपने को क्या ...
फिर दिमाग़ ने बत्ती जलायी,अरे फ़िल्म के नाम में ही है “zindgi na milegi dobara "
,तो क्यूँ ना इसी पर अमल किया जाए, भोला सा चेहरा बनाया और उससे कहा,
“देखी है आपने ये?”
“ये, हाँ देखी है, अच्छी है”
“गहरी बात कर दी आपने”
“बस, कर लेते हैं कभी कभी सामने वाला गहरा हो तो, वरना चंचल ही रहते हैं”
“अच्छा”
आप गहरी टाइप लगती हैं, माथे पर छोटी बिंदिया , लखनवी चिकेन शूट और ये तिल देख कर,
मैंने भी टटोलते हुए पूछा "कहि मै तो यूँ ही कहीं आपका वक़्त नही ले रहा?”
“ले तो रहे हैं लेकिन अब मैं ट्रेन में से बीच में रास्ते में उतर नही सकती ना”
“ओह हाँ ये भी तो है, बच गए”
“वैसे आपने सही कहा,मन करता है कभी कभी ढेर सारी बातें करने का पर कोई आस पास होता नही, आस पास तो सब बिज़ी रहते हैं”
“कैसी लड़कीं चाहिए आपको जी ?”
“जी लडक़ी हो औऱ ज़िंदा हो
हम तो इतने सिंगल है कि इसमें भी खुश हो जायेगे ”
“ओह अच्छा” और तेज़ तेज़ हसने लगी
“पक्का?”
“पक्का”
वो ट्रेन से उतर चुकी थी ,
प्लेटफार्म पीछे जा रहा था या मैं आगे बढ़ने लगा था
मैं समंझ न सका , तब तक पता चला कि
अरे कहानीबाज़ ट्रेन चल दी है आपकी
उसने जाते जाते आवाज लगाई
""तो इच्छा पूरी हुई न आपकी आज कहानीबाज़ ""
मैं बोला " लेकिन एक अधूरी इच्छा नई बन गयी "
"अरे वो क्या है जी अब ""
मैं बोला " आपका नम्बर तो ले ही नही पाया "
प्लेटफार्म की तमाम शोर के बीच उसकी हँसी एकदम ही गुज़ गयी
"फिर मिलेंगे किसी शहर में ऐसे ही अनजान बनकर
तब ले लीजयेगा मेरा नम्बर "
अच्छा मैडम और आप उस दिन भी न दी तो.......
""अरे आप मांग के तो देखिएगा जनाब ""
उस रूट की तमाम ट्रेनों में आज भी ढूढता है नज़र
इसलिए नही की नम्बर मिल जाये
बल्कि इसलिए ताकि मेरी कहानी पूरी हो जाये
आराम से एक सीट पकड़ के बैठ कर देखता रहता हूँ
खासकर "खिड़की वाली सीट"
""क्योंकि किरदार ट्रेन में होते है पर "कहानिया" तो खिड़कियों से ही झांकती है
इसलिए मैं खिड़कियों को पकड़ लेता हूं कहानियों के लिए
कहानियाँ,कहीं मिलने की तो कहीं बिछड़ने की..
किसी के पकड़ने की तो किसी के छूटने की
पर
हर ट्रेन कहानियां जरूर दे जाता है
अक्सर मेरी क़िस्मत खराब ही रही है ट्रेन में,
मतलब ज़्यादातर कोई झुर्रियो वाला चेहरा होता है पास में
या बाहर कमाने जाने वाला शर्ट खोलकर बनियान में बैठा कोई प्रवासी
बस साल में एक दो बार ही ऐसा होता है कि सुंदर काया औऱ अदाओं की कोई माया बैठी हो आस पास
ख़ैर ठीक है, उन्हें भी तो ब्रेक चाहिए..
मैं अपनी सीट पर बैठा था फ़िल्म लगाए
" Zindgi na milegi dobara "
अचानक सिक्स्थ सेन्स ने काम करना शुरू कर दिया, लगता है कोई आ रही है बग़ल वाली सीट पर,
धक धक, आंटी हुई तो
नही नही, फिर सो जाएँगे और क्या,
मन बातें कर ही रहा था के एक आवाज़ आयी,
“Can you shift to middle seat please ?”
( दिमाग़ दौड़ा, बीच में बैठी तो खिड़की वाला भी बात कर सकता है, नही नही)
बस मैं यूपी बोर्ड का छात्र अपने अंदर की सारी इंग्लिश ग्रामर इक्कठा किया और बोला
“Yaa sure "
(ऐसे कूल हो के जवाब दिया जैसे इतना तो मैं कर ही सकता हूँ तुम्हारे लिए)
“थैंक यू”
सीट पर कम्फ़्टर्बल होने के बाद मैं अपने फ़ोन में “zindgi na milegi dobara "
देखने लग गया जैसे परवाह नही कोई भी बैठे अपने को क्या ...
फिर दिमाग़ ने बत्ती जलायी,अरे फ़िल्म के नाम में ही है “zindgi na milegi dobara "
,तो क्यूँ ना इसी पर अमल किया जाए, भोला सा चेहरा बनाया और उससे कहा,
“देखी है आपने ये?”
“ये, हाँ देखी है, अच्छी है”
(सेम लाइकिंग, मतलब बात आगे बढ़ सकती है)
“मुझे ऐसी ही फ़िल्में पसंद है,लाइट, रोमांटिक, हंसी मज़ाक़ वाली के साथ ट्रेवल lovers ”
“अच्छा,वैसे आप हंसी मज़ाक़ वाले लगते भी हैं”
अंदर ही अंदर मैं -
“मुझे ऐसी ही फ़िल्में पसंद है,लाइट, रोमांटिक, हंसी मज़ाक़ वाली के साथ ट्रेवल lovers ”
“अच्छा,वैसे आप हंसी मज़ाक़ वाले लगते भी हैं”
अंदर ही अंदर मैं -
(ओह, मुझे gear चेंज करना होगा)
"घूमना पसन्द है आपको भी "" - उसने पूछा
मैं बोला ""हा जी बहुत, बचपन से ही बस वो बेरोजगारी ने थोड़ा रोक रखा है ""
हा हा हा हा हा हा हा..........
“जी वो तो पता नही,
"घूमना पसन्द है आपको भी "" - उसने पूछा
मैं बोला ""हा जी बहुत, बचपन से ही बस वो बेरोजगारी ने थोड़ा रोक रखा है ""
हा हा हा हा हा हा हा..........
“जी वो तो पता नही,
अच्छा आपको समुन्दर पसंद है या पहाड़, दोनो मत कहिएगा” मैंने प्रश्न से सुरुआत की
“समुन्दर”
“समुन्दर”
( एकदम क्लीयर जवाब था जैसे कि उसकी क्लीयर खूबसूरती थी )
मेरे अंदर का उत्तर भी फुट पड़ा (“मुझे भी समंदर , जहां गहरा वहाँ शांत, और तट पर चंचल”)
मेरे अंदर का उत्तर भी फुट पड़ा (“मुझे भी समंदर , जहां गहरा वहाँ शांत, और तट पर चंचल”)
“गहरी बात कर दी आपने”
“बस, कर लेते हैं कभी कभी सामने वाला गहरा हो तो, वरना चंचल ही रहते हैं”
“अच्छा”
आप गहरी टाइप लगती हैं, माथे पर छोटी बिंदिया , लखनवी चिकेन शूट और ये तिल देख कर,
सुना है जिनके होंठों के ऊपर तिल होता है वो बातें बहुत करते हैं”
“आप ज्योतिष हैं क्या”
“नही, मन पढ़ लेता हूँ अक्सर”
“अच्छा, और क्या पढ़ा?”
ये की आप मन की बातें करना चाहती तो हैं लेकिन कर नही पा रही हैं, एक झिझक है आप में, रुका है कुछ”
“ओह, आप कमाल हैं, कैसे पता?”
“बस कहा ना मन की बातें पढ़ लेते हैं कभी कभी, आप ज़्यादा सोचा ना करें, कर लिया करें बातें, अफसोस देगा वरना आपको ज़्यादा अगर मन में रखा तो
क्योंकि हम हर किसी के सफर में न मिल पाते
अच्छा जी , अपनी तारीफ अपने ही मुह से ...वाह जनाब !!
“हॉस्टल में लेट आती हु , मै काम भी करती हूँ, वक़्त नही मिलता”
“वक़्त किसे है आज, ख़ुद के लिए तो निकालना पड़ता है,
“आप ज्योतिष हैं क्या”
“नही, मन पढ़ लेता हूँ अक्सर”
“अच्छा, और क्या पढ़ा?”
ये की आप मन की बातें करना चाहती तो हैं लेकिन कर नही पा रही हैं, एक झिझक है आप में, रुका है कुछ”
“ओह, आप कमाल हैं, कैसे पता?”
“बस कहा ना मन की बातें पढ़ लेते हैं कभी कभी, आप ज़्यादा सोचा ना करें, कर लिया करें बातें, अफसोस देगा वरना आपको ज़्यादा अगर मन में रखा तो
क्योंकि हम हर किसी के सफर में न मिल पाते
अच्छा जी , अपनी तारीफ अपने ही मुह से ...वाह जनाब !!
“हॉस्टल में लेट आती हु , मै काम भी करती हूँ, वक़्त नही मिलता”
“वक़्त किसे है आज, ख़ुद के लिए तो निकालना पड़ता है,
किसी के पास उतनी समय जरूर होना चाहिए
जितने समय मे सुना जा सके
वो सारे बाते जो वो कभी कह नही पाते
मैंने भी टटोलते हुए पूछा "कहि मै तो यूँ ही कहीं आपका वक़्त नही ले रहा?”
“ले तो रहे हैं लेकिन अब मैं ट्रेन में से बीच में रास्ते में उतर नही सकती ना”
“ओह हाँ ये भी तो है, बच गए”
“वैसे आपने सही कहा,मन करता है कभी कभी ढेर सारी बातें करने का पर कोई आस पास होता नही, आस पास तो सब बिज़ी रहते हैं”
उसके इन दो वाक्य में करुण और श्रृंगार रस दोनो का प्रवाह हो गया
“कौन आजकल किसी से फुर्सत से बात करता है सब बताने के लिए”
“ओह,आप नही बात करते अपनी girlfriend से?”
“मैं बहुत बातें करता हूँ उससे, इतना करता हूँ कि सब बात उसी पर खत्म हो जाता है
आज का बचा हुआ dose आपसे बात करकर खत्म कर रहा हु "
“हाहा, ये अच्छा था , मतलब आपकी girlfriend नही है ” और वो हसने लगी..
“कौन आजकल किसी से फुर्सत से बात करता है सब बताने के लिए”
“ओह,आप नही बात करते अपनी girlfriend से?”
“मैं बहुत बातें करता हूँ उससे, इतना करता हूँ कि सब बात उसी पर खत्म हो जाता है
आज का बचा हुआ dose आपसे बात करकर खत्म कर रहा हु "
“हाहा, ये अच्छा था , मतलब आपकी girlfriend नही है ” और वो हसने लगी..
मैंने भी कठोर सिंगलता का परिचय दिया और हामी भर दी .
“कैसी लड़कीं चाहिए आपको जी ?”
“जी लडक़ी हो औऱ ज़िंदा हो
हम तो इतने सिंगल है कि इसमें भी खुश हो जायेगे ”
“ओह अच्छा” और तेज़ तेज़ हसने लगी
पहली बार कोई कन्या मेरे साथ सफर में बैठी है
एक wish तो पूरी हो गयी आज ...........
"चलिए हम आपके किसी काम तो आ सके ""
बस तीस मिनट थे अगले स्टॉप के आने में..
बस तीस मिनट थे अगले स्टॉप के आने में..
सब हिम्मत जुटाकर बोला “आप ख़ूबसूरत है”
अच्छा जी शुक्रिया”
कुछ सेकंड की चुप्पी..
चुप्पी उसने खत्म की और मुझसे बोली “आपको यही कहना था मुझसे के मै ख़ूबसूरत हूँ या और?”
“नही, बस इतना ही”
“पक्का?”
“आप ऐसा क्यूँ पूछ रही हैं बार बार?”
“क्यूँकि मुझे पता है आपका मुझसे बातें करने का और मन है”
“और आपका?”
“मेरा भी”
“तो अब?”
“आपको मेरा नम्बर माँगना चाहिए शायद”
“आप दे देंगी नम्बर?” मैंने उत्सुक और नर्वस दोनो मिक्स फिलिग से पूछा
“आप पूछिए तो”
“आरोही , आपका नम्बर मिलेगा?”
“अरे आपको मेरा नाम कैसे पता?”
“लो इसमें कौन सी बड़ी बात है,
मैंने बोला न कि मैं पढ़ लेता हूं मन
"हा हा हा हा चलिए अब बताइये आपको नाम कैसे पता ""
T.C.जब टिकेट चेक कर रहा था मैंने आपका टिकेट देख लिया था”
“ओह स्मार्ट, boy
आप करते क्या हैं? ”
""जी बस एक सुंदर कन्या की आस में पढ़ाई करता हु ""
अच्छा जी , और सुंदर कन्या के अलावा क्या पसन्द आपको
“ जी , मैं कहानियाँ लिखता हूँ”
“ओह तो ये वाली लिखेंगे?”
“आप कहेंगी तो ज़रूर, बिना किसी की मर्ज़ी के मैं नही करता कुछ”
“और आपकी मर्ज़ी का क्या है smart boy ”
“वो, किसी ने पूछा ही नही आज तक”
"अच्छा जी "
“चलिए उतरिए अब, वरना ये ट्रेन हमें आगे ले जाएँगे किसी और शहर”
“चलिए आपके साथ किसी और शहर जाएँगे ज़रूर
अच्छा जी शुक्रिया”
कुछ सेकंड की चुप्पी..
चुप्पी उसने खत्म की और मुझसे बोली “आपको यही कहना था मुझसे के मै ख़ूबसूरत हूँ या और?”
“नही, बस इतना ही”
“पक्का?”
“आप ऐसा क्यूँ पूछ रही हैं बार बार?”
“क्यूँकि मुझे पता है आपका मुझसे बातें करने का और मन है”
“और आपका?”
“मेरा भी”
“तो अब?”
“आपको मेरा नम्बर माँगना चाहिए शायद”
“आप दे देंगी नम्बर?” मैंने उत्सुक और नर्वस दोनो मिक्स फिलिग से पूछा
“आप पूछिए तो”
“आरोही , आपका नम्बर मिलेगा?”
“अरे आपको मेरा नाम कैसे पता?”
“लो इसमें कौन सी बड़ी बात है,
मैंने बोला न कि मैं पढ़ लेता हूं मन
"हा हा हा हा चलिए अब बताइये आपको नाम कैसे पता ""
T.C.जब टिकेट चेक कर रहा था मैंने आपका टिकेट देख लिया था”
“ओह स्मार्ट, boy
आप करते क्या हैं? ”
""जी बस एक सुंदर कन्या की आस में पढ़ाई करता हु ""
अच्छा जी , और सुंदर कन्या के अलावा क्या पसन्द आपको
“ जी , मैं कहानियाँ लिखता हूँ”
“ओह तो ये वाली लिखेंगे?”
“आप कहेंगी तो ज़रूर, बिना किसी की मर्ज़ी के मैं नही करता कुछ”
“और आपकी मर्ज़ी का क्या है smart boy ”
“वो, किसी ने पूछा ही नही आज तक”
"अच्छा जी "
“चलिए उतरिए अब, वरना ये ट्रेन हमें आगे ले जाएँगे किसी और शहर”
“चलिए आपके साथ किसी और शहर जाएँगे ज़रूर
क्योंकि आप तो हर किसी के सफर में नही मिलते न ”
हम दोनो खिलखिलाकर हस पड़े
हम दोनो खिलखिलाकर हस पड़े
“पक्का?”
“पक्का”
वो ट्रेन से उतर चुकी थी ,
प्लेटफार्म पीछे जा रहा था या मैं आगे बढ़ने लगा था
मैं समंझ न सका , तब तक पता चला कि
अरे कहानीबाज़ ट्रेन चल दी है आपकी
उसने जाते जाते आवाज लगाई
""तो इच्छा पूरी हुई न आपकी आज कहानीबाज़ ""
मैं बोला " लेकिन एक अधूरी इच्छा नई बन गयी "
"अरे वो क्या है जी अब ""
मैं बोला " आपका नम्बर तो ले ही नही पाया "
प्लेटफार्म की तमाम शोर के बीच उसकी हँसी एकदम ही गुज़ गयी
"फिर मिलेंगे किसी शहर में ऐसे ही अनजान बनकर
तब ले लीजयेगा मेरा नम्बर "
अच्छा मैडम और आप उस दिन भी न दी तो.......
""अरे आप मांग के तो देखिएगा जनाब ""
उस रूट की तमाम ट्रेनों में आज भी ढूढता है नज़र
इसलिए नही की नम्बर मिल जाये
बल्कि इसलिए ताकि मेरी कहानी पूरी हो जाये
और उससे पूछ सकू की "ये वाली कहानी लिख सकता हु न "
पर
उस दिन लगा कि
पर
उस दिन लगा कि
" कुछ कहानियों का अधूरा रहना ही उनकी खूबसूरती होती है ""
खैर फिर कभी ........
खैर फिर कभी ........
- आशु ❤️
Hi
ReplyDeleteSo sweet
ReplyDeleteI lost in your story, epic writer you are👌👌,बस लड़की हो और ज़िंदा हो, made me laugh...
ReplyDelete😁😁❤️
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