बनारस के तोहफे
मैं कभी समंझ नही पाया कि उसे क्या तोहफे देने है , उसे क्या जरूरत होगी ।उसकी हर पसंदीदा चीज़ को " हा अच्छा है ले लो " ही कहता रहा हु ।
मैं ये न समंझ पाया कि
वो मुझे देना चाहिए या उसे खरीदने के लिये कहना चाहिए।
मैं हमेशा ठीक ठाक टाइप का ही व्यवहार करता रहा हु । ऐसे तो हम महीनों - सालों नही मिला करते है तो लेन देन हमारे प्रेम की परिचायक नही रही ।
दूसरा अब मेरी उम्र
आजकल प्रेम में पड़े उन जोशीले प्रेमी - प्रेमिकाओं की तरह भी नही रही जो तोहफों के कतारे लगाए रहते है ।
एक उम्र के बाद हम सीख जाते है कि प्रेम और बिना बादल वाली बरसात में कोई फर्क नही रहता ।
दिन भर बरसना औऱ एक घण्टे की जोरदार बारिश में चुनना हो तो सायद हम सारे लोग एक घण्टे की घनघोर बारिश ही चुनेंगे ।
जब भी उससे मिलने के लिये पूछता कहती थी " ठंडी की दिनों में जब एक पूरी दिन बिना रुके बरसात होगी तो उसके अगले दिन
खिलने वाली ठंडी ओस और सफेद कोहरे के बीच मिलेंगे ।
मैं मज़ाक में कहता " एक बार मिलने आ जाओगी न तो फिर लौटने का मन नही करेगा "
वो दिन कभी न आएगा उसे भी पता था मुझे भी
क्योंकि ऐसा जियोग्राफिकल सिचुएशन का कोई ठिकाना न
फिर भी मुझे वो ठंडी दिनों के बरसात का इंतज़ार रहता था ।
क्योंकि घनघोर बरसात रुकने का अगला दिन ही हमारे रिश्ते का नाम ,पता , तारीख और पिनकोड सब था ।
इस कहानी की लड़कीं का कोई नाम नही है ,
क्योंकि ऐसी लड़कियों का नाम नही होता, वो कही भी मिल सकती है आपको कोहरे के बीच मे ।
तो तय हुआ कि चलो मिल लेते है ..........
जगह बनारस ।
"बनारस" इसलिए क्योंकि हम दोनों बनारस में ही मिले थे
और हमसे "बनारस" भी वही मिला था ।
वो कहते है न
""प्रेम का जिक्र भी न होगा जिसकी राशि मे
उसे प्रेम या वो प्रेम को मिल जायेगा काशी में ""
हम शायद अपनी याद का हर एक रंग बनारस के साथ चाहते थे।
हमने तय किया तय कि साथ बैठकर बरसात का इंतज़ार करेंगे।
हमने रेस्टुरेंट में इन किया और खाने के साथ बरसात का इंतज़ार की बाते सुरु हुई।
बातें ज़्यादा थीं नहीं बस मुलाकात की ही बैचैनी थी
अगले ही पल कब 4 बज गए पता न चला
वो ब्राउनी पेस्ट्री पिघल चुकी थी टेबल पर ही जो 1 घण्टे पहले ही ऑर्डर आ चुकी थी
बिल भरकर गौदवलिया की तरफ निकले क्योंकि
मेरी ट्रेन शाम 6 बजे की थी।
मैं ऑटो बुला ही पाता कि
वो हमें खींच कर एक लाइटों के चकाचौध से भरे दुकान में ले गयी
मैं कुछ कह पाता या पूछ पाता तब तक.............
"ये लिया है तुम्हारे लिए "
ये लाइने सुनकर ही हमे हमारा सारा प्रेम शून्य लगने लगा ।
ऐसा लगा मानो बाबा विश्वनाथ के मंदिर में आ गए है औऱ बेलपत्र और गंगाजल तो लाये ही नही गुरु ""
(अर्थात मैं तो देने के लिए कुछ लाया ही नही .........)
उसके हाथों में ब्राउन रंग की पर्स थी
वो ब्राउन रंग मेरे प्रेम को काला और मुझे सफेद करने लगा।
"तुम्हे कोई और रंग पसंद हो तो यहां से बदल सकते हो इसलिए लाई हु दुकान पर "
मेरा अंगद वाला पैर और जामवंत वाला भालू की तरह चेहरा भला क्या ही नखरे करता
उसके योग्य मैं बचा भी न था अब .......
फिर भी हामी भरी ""नही नही , खूबसूरत है ब्राउन रंग की पर्स अच्छा लगता है जेंट्स पर ""
मैंने कहा तुम भी ले लो कुछ मैं खरीद देता हूं तुम्हारे लिए
उसने कहा प्रेम की मुलाकातो में तोहफ़ों की हिसाब बराबर नही की जाती ,
तोहफे लाये जाते है बस .....खरीदे नही
दुकानदार ने मेरी हामी के साथ ही बिल बनाना चालू कर दिया था
उसने वो बिल उसके नाम का बना दिया
फिर इसने मना किया "" नही नही मेरा नाम काट दीजिये ये पर्स इनको लेना है तो इनका ही नाम लिखिए "
नाम कटने ही वाला था कि मैंने टोका "" आप बिना नाम काटे आगे मेरा भी नाम लिख दीजिये , इनका नाम न काटिये ""
अगले आधे घण्टों में पूरा बनारस सराबोर हो चुका था।
किसी को नहीं पता था कि हम बनारस में हैं।
न ही हम किसी को बता सकते थे।
ये साल 2024 का था और तारीख थी 14 फरवरी ,
उस दुकान का बिल रजिस्टर दुनिया में इकलौती जगह थी जहाँ हमारा नाम एक साथ लिखा था।
मुझे वो शाम की याद आज भी आती है
और उसका 'कैसा है ये गिफ्ट' पूछना
बनारस में वो ओस और कोहरे घने हो चुके थे
जो हम दोनों ने सालों से रोक कर रखा था।
उसकी ऑटो और मेरे बैटरी रिक्शा धुंध और कोहरो के बीच धीरे धीरे गायब होने लगी
तब लगा ऐसी लड़किया बहुत कम मिला करती है जो ओंस और कोहरो के बीच के मुलाकातो में तोहफे लाया करती है ।
मैं ये न समंझ पाया कि
वो मुझे देना चाहिए या उसे खरीदने के लिये कहना चाहिए।
मैं हमेशा ठीक ठाक टाइप का ही व्यवहार करता रहा हु । ऐसे तो हम महीनों - सालों नही मिला करते है तो लेन देन हमारे प्रेम की परिचायक नही रही ।
दूसरा अब मेरी उम्र
आजकल प्रेम में पड़े उन जोशीले प्रेमी - प्रेमिकाओं की तरह भी नही रही जो तोहफों के कतारे लगाए रहते है ।
एक उम्र के बाद हम सीख जाते है कि प्रेम और बिना बादल वाली बरसात में कोई फर्क नही रहता ।
दिन भर बरसना औऱ एक घण्टे की जोरदार बारिश में चुनना हो तो सायद हम सारे लोग एक घण्टे की घनघोर बारिश ही चुनेंगे ।
जब भी उससे मिलने के लिये पूछता कहती थी " ठंडी की दिनों में जब एक पूरी दिन बिना रुके बरसात होगी तो उसके अगले दिन
खिलने वाली ठंडी ओस और सफेद कोहरे के बीच मिलेंगे ।
मैं मज़ाक में कहता " एक बार मिलने आ जाओगी न तो फिर लौटने का मन नही करेगा "
वो दिन कभी न आएगा उसे भी पता था मुझे भी
क्योंकि ऐसा जियोग्राफिकल सिचुएशन का कोई ठिकाना न
फिर भी मुझे वो ठंडी दिनों के बरसात का इंतज़ार रहता था ।
क्योंकि घनघोर बरसात रुकने का अगला दिन ही हमारे रिश्ते का नाम ,पता , तारीख और पिनकोड सब था ।
इस कहानी की लड़कीं का कोई नाम नही है ,
क्योंकि ऐसी लड़कियों का नाम नही होता, वो कही भी मिल सकती है आपको कोहरे के बीच मे ।
तो तय हुआ कि चलो मिल लेते है ..........
जगह बनारस ।
"बनारस" इसलिए क्योंकि हम दोनों बनारस में ही मिले थे
और हमसे "बनारस" भी वही मिला था ।
वो कहते है न
""प्रेम का जिक्र भी न होगा जिसकी राशि मे
उसे प्रेम या वो प्रेम को मिल जायेगा काशी में ""
हम शायद अपनी याद का हर एक रंग बनारस के साथ चाहते थे।
हमने तय किया तय कि साथ बैठकर बरसात का इंतज़ार करेंगे।
हमने रेस्टुरेंट में इन किया और खाने के साथ बरसात का इंतज़ार की बाते सुरु हुई।
बातें ज़्यादा थीं नहीं बस मुलाकात की ही बैचैनी थी
अगले ही पल कब 4 बज गए पता न चला
वो ब्राउनी पेस्ट्री पिघल चुकी थी टेबल पर ही जो 1 घण्टे पहले ही ऑर्डर आ चुकी थी
बिल भरकर गौदवलिया की तरफ निकले क्योंकि
मेरी ट्रेन शाम 6 बजे की थी।
मैं ऑटो बुला ही पाता कि
वो हमें खींच कर एक लाइटों के चकाचौध से भरे दुकान में ले गयी
मैं कुछ कह पाता या पूछ पाता तब तक.............
"ये लिया है तुम्हारे लिए "
ये लाइने सुनकर ही हमे हमारा सारा प्रेम शून्य लगने लगा ।
ऐसा लगा मानो बाबा विश्वनाथ के मंदिर में आ गए है औऱ बेलपत्र और गंगाजल तो लाये ही नही गुरु ""
(अर्थात मैं तो देने के लिए कुछ लाया ही नही .........)
उसके हाथों में ब्राउन रंग की पर्स थी
वो ब्राउन रंग मेरे प्रेम को काला और मुझे सफेद करने लगा।
"तुम्हे कोई और रंग पसंद हो तो यहां से बदल सकते हो इसलिए लाई हु दुकान पर "
मेरा अंगद वाला पैर और जामवंत वाला भालू की तरह चेहरा भला क्या ही नखरे करता
उसके योग्य मैं बचा भी न था अब .......
फिर भी हामी भरी ""नही नही , खूबसूरत है ब्राउन रंग की पर्स अच्छा लगता है जेंट्स पर ""
मैंने कहा तुम भी ले लो कुछ मैं खरीद देता हूं तुम्हारे लिए
उसने कहा प्रेम की मुलाकातो में तोहफ़ों की हिसाब बराबर नही की जाती ,
तोहफे लाये जाते है बस .....खरीदे नही
दुकानदार ने मेरी हामी के साथ ही बिल बनाना चालू कर दिया था
उसने वो बिल उसके नाम का बना दिया
फिर इसने मना किया "" नही नही मेरा नाम काट दीजिये ये पर्स इनको लेना है तो इनका ही नाम लिखिए "
नाम कटने ही वाला था कि मैंने टोका "" आप बिना नाम काटे आगे मेरा भी नाम लिख दीजिये , इनका नाम न काटिये ""
अगले आधे घण्टों में पूरा बनारस सराबोर हो चुका था।
किसी को नहीं पता था कि हम बनारस में हैं।
न ही हम किसी को बता सकते थे।
ये साल 2024 का था और तारीख थी 14 फरवरी ,
उस दुकान का बिल रजिस्टर दुनिया में इकलौती जगह थी जहाँ हमारा नाम एक साथ लिखा था।
मुझे वो शाम की याद आज भी आती है
और उसका 'कैसा है ये गिफ्ट' पूछना
और
मेरा 'अच्छा है ले ली ,'
मेरा 'अच्छा है ले ली ,'
पूरा बनारस कोहरे में डूबने लगा मानो हिमालय की हवाओ का रुख
बाबा विश्वनाथ के द्वार की तरफ हो चुका हो ।
बनारस में वो ओस और कोहरे घने हो चुके थे
जो हम दोनों ने सालों से रोक कर रखा था।
उसकी ऑटो और मेरे बैटरी रिक्शा धुंध और कोहरो के बीच धीरे धीरे गायब होने लगी
तब लगा ऐसी लड़किया बहुत कम मिला करती है जो ओंस और कोहरो के बीच के मुलाकातो में तोहफे लाया करती है ।
- आशु ❤️
वाह गुरु बेहद खूबसूरत 💗💗👌🏻👌🏻
ReplyDelete❤️❤️❤️
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